भाद्रपद महीने (Bhadon Month) की शुक्‍ल पक्ष (Shukla Paksh) की सप्‍तमी तिथि (Saptami Tithi) को संतान सप्तमी (Santan Saptami) कहते हैं, इसे मुक्ताभरण व्रत (Muktabhran Fast) और  ललिता सप्तमी (Lalita Saptami) नाम से भी जाना जाता है। आईये जानते हैं संतान सप्तमी व्रत का महत्व (Importance of Santan Saptami Vrat)

संतान सप्तमी व्रत का महत्व - Santan Saptami Vrat Ka Mahatva

संतान सप्तमी व्रत (Santan Saptami Fast) विशेष रुप से संतान प्राप्ति, संतान रक्षा और संतान की उन्नति के लिये किया जाता है। इस व्रत में, भगवान विष्‍णु, भगवान शंकर और माता गौरी की पूजा करनी चाहिये, ऐसी मान्‍यता है देवकी तथा वसुदेव ने कंस से अपनी संतानों रक्षा के लिये लोमश ऋषि के कहने पर संतान सप्तमी व्रत (Santan Saptami Fast) रखा था। 

यह राधा अष्‍टमी (Aadha Ashtami) से ठीक एक दिन पहले पडता है, इसलिये इसे ललिता सप्तमी (Lalita Saptami) भी कहते हैं, देवी ललिता राधा जी की आठ प्रमुख सखियों में से एक हैं। श्री राधारानी और भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय सखी होने केे कारण यह दिन उनको समर्पित किया गया है। यह एक बहुत ही शुभ दिन है और एक काफी महत्व रखता है। 

निराहार व्रत कर, दोपहर को चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से शिव- पार्वती की पूजा करनी चाहिए।सप्तमी तिथि के व्रत में नैवेद्ध के रुप में खीर-पूरी तथा गुड के पुए बनाये जाते है। संतान की रक्षा की कामना करते हुए भगवान भोलेनाथ को कलावा अर्पित किया जाता है तथा बाद में इसे स्वयं धारण कर इस व्रत की कथा सुननी चाहिए।

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