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भाद्रपद महीने (Bhadon Month) की शुक्‍ल पक्ष (Shukla Paksh) की पूर्णिमा (Purnima) से प्रारंभ होकर कृष्ण पक्ष अमावस्या (Amavasya) तक के पंद्रह दिनों को पितृपक्ष (Pitru Paksha) या श्राद्ध पक्ष (Shradh Paksha) कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में श्राद्ध कर्म और तर्पण का विशेष महत्‍व होता है, आईये जानते हैं पितृपक्ष में श्राद्ध का महत्व (Pitru Paksha Shraddh Ka Mahatva) -

पितृपक्ष में श्राद्ध का महत्व - Pitru Paksha Shraddh Ka Mahatva

पितृपक्ष (Pitru Paksha) के दौरान लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल अर्पित करते हैं, इसे तर्पण (Tarpan) कहते हैं और उनकी मृत्युतिथि वाले दिन उनका श्राद्ध करते हैं, जिसमें उनके नाम से ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, श्राद्ध पक्ष (Shradh Pakshya) के समय प्रत्‍येक परिवार में मृत माता-पिता और पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, ऐसी मान्‍यता है कि श्राद्ध करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है, इसलिये इसे पितृयज्ञ भी कहा जाता है।

पितृ तर्पण विधि - Pitru Tarpan Vidhi

सबसे पहले शुद्ध जल में थोडा सा दूध, काले तिल और कुश ले लें, यह वही कुश है जो कुशग्रहणी अमावस्या (Kush Grahani Amavasya) पर एकत्रित की जाती है। इस कुश (Kush) को लपेटकर छल्ला या अंगूठी (Ring) का आकार दे दें, इसे पवित्री (Pavitri) कहते हैं, दोनों हाथों के अनामिका उंंगली अथवा रिंग फिंगर (Ring finger) में इसें पहनें और बाएं कंधे पर सफेद वस्त्र डालकर दोनों हाथ जोड़कर अपने पितरों को जल अर्पित करें।

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