ज्येष्ठ मास (Jyeshtha Maas) के कृष्ण पक्ष (krishna paksha) की एकादशी (Ekadashi) को अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) कहते हैं, अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) को अचला एकादशी (Apara Ekadashi ) के नाम से भी जाना जाता है अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) व्रत रखने से सभी पापो का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है तो आइये जानते है - अपरा एकादशी का महत्व - Apara Ekadashi Ka Mahatva

अपरा एकादशी का महत्व - Apara Ekadashi Ka Mahatva

ऐसा माना जाता है कि अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) का व्रत करने से ब्रह्मा हत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करने वाला, गर्भस्थ शिशु को मारने वाला, दूसरों की निंदा करने वाला , परस्त्रीगामी भी अपरा एकादशी का व्रत रखने से पापमुक्त हो जाता है यह मान्यता है कि अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) का व्रत एक दिन पहले दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू करना चाहिए, एकादशी को सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिये तथा पूरे दिन उपवास रखना चाहिये, और एक समय भोजन करना चाहिये ।इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। भगवान विष्‍णु की पूजा करने से पहले भगवान को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें

अचला एकादशी व्रत कथा - Achala Ekadashi Vrat Katha

महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

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