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गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) हिंदु धर्म का एक प्रमुख त्‍यौहार है ऐसे मान्‍यता है कि गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन ही भगवान श्री गणेश का जन्‍म हुआ था, गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) को पर्व को गणशोत्सव या विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे 10 दिन तक चलता है और अनंत चतुर्दशी वाले दिन गणशोत्सव का समापन होता है, इस समय भगवान गणेश की पूजा घर घर में की जाती है आईये जानते हैं गणेश चतुर्थी व्रत कथा एवं पूजन विधि (Ganesh Chaturthi Puja Vidhi - Vrath Katha)

गणेश चतुर्थी व्रत कथा एवं पूजन विधि - Ganesh Chaturthi Puja Vidhi And Vrath Katha

गणेश चतुर्थी पूजन विधि - Ganesh Chaturthi Puja Vidhi

  • सबसे पहले गणेश चतुर्थी को एक अच्छा सा महूर्त निकालकर अपने घर में गणेश जी की स्थापना करें
  • जिस जगह पर हमें गणेश जी की स्थापना करनी होती है उस जगह पर रंगोली (चौक ) बनाते है और एक लकड़ी के पत्ते पर लाल या पीला कपडा बिछा देते हैं 
  • उस कपडे पर केले के पत्ते पर मूर्ति की स्थापना की जाती है 
  • और गणेश जी के पास ही एक कलश की स्थापना की जाती है जो 11 दिन तक या जितने भी दिन के लिए आप गणेश जी को अपने घर लाये है उतने दिन वहीँ रखा जाता है कलश के ऊपर एक हरा नारियल भी होता है जो विसर्जन वाले दिन प्रसाद के रूप में बांटा जाता है 
  • सबसे पहले कलश की पूजा अर्चना रोली, कुमकुम, चावल, फूल और मिठाई से की जाती है 
  • उसके बाद गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है गणेश जी को विशेष रूप से दूर्वा चढाई जाती है और गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय होते है इसलिये गणश जी को मोदक का भोग लगाकर पूरे परिवार के साथ आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है 

गणेश चतुर्थी व्रत कथा - Ganesh Chaturthi Vrat Katha 

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है. कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा? इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई.यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.

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