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आश्चिन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) कहा जाता है शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) को कोजोगार पूर्णिमा व्रत और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है

Sharad Purnima or Kojagari Purnima or Kumar Purnima

Sharad Purnima Vrat Vidhi, Vrat Katha In Hindi - शरद पूर्णिमा व्रत विधि और कथा 

शरद पूर्णिमा व्रत विधि  Sharad Purnima Vrat Vidhi

ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) के दिन यदि श्रीसूक्त, लक्ष्मीस्तोत्र का पाठ करके हवन किया जाये तो माता लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं  धन की देवी माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) के दिन हुआ था। इसलिये शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) के दिन लक्ष्‍मी पूजा (Lakshmi Puja) का विधान है, शरद पूर्णिमा के दिन रात में लक्ष्‍मी की पूूजा करने से और उनको खीर का भोग लगाने से मनुष्‍य की सभी मनोकानायें पूर्ण होती हैं, धन-सम्पत्ति और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।ऐसा मान्यता है कि शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) भगवान श्रीकृष्ण ने महारास लीला की थी, इसलिये इसे रास पूर्णिमा (Raas purnima) भी कहते हैं

शरद पूर्णिमा स्‍पेशल खीर रेसिपी


शरद पूर्णिमा व्रत कथा - Sharad Purnima Vrat Katha In Hindi

शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा इस प्रकार है - एक साहुकार की दो पुत्रियां थीं। कहते हैं कि वे दोनों पुत्रियां ही अच्छे फल के प्राप्ति के लिए पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। परन्तु बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी।प्रत्येक पूर्णिमा पर दोनों इसी तरह से व्रत करती थीं, लेकिन छोटी पुत्री द्वारा रखे जा रहे अधूरे व्रत की सच्चाई किसी को पता नहीं थी। जिसका आगे चलकर बुरा परिणाम हुआ... छोटी पुत्री की सन्तान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है।पंडितों से इसका उपाय पूछने पर मालूम हुआ कि यदि वह पूर्णिमा का पूरा विधिपूर्वक व्रत करेगी तो उसकी संतान मरेगी नहीं। उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। जिसके बाद उसके यहां लड़का हुआ परन्तु वह भी शीघ्र ही मर गया।यह देख तो मानो वह हताश हो गई, लेकिन इस बार उसने सोच लिया कि वह अपने बच्चे को वापस पाकर ही रहेगी। इसलिए उसने उसने लड़के को बैठने वाले एक पीढ़े पर लिटाकर ऊपर से कपड़ा ढक दिया, जिसके कारण बच्चा दिखाई ही नहीं दे रहा था।फिर उसने अपनी उसी बड़ी बहन को बुलाया, जो उसके साथ बचपन से ही पूर्णिमा का पूर्ण व्रत करती थी। बुलाने पर उसके बहन आए और बैठने के लिए छोटी बहन ने वही पीढ़ा दे दिया। बडी बहन जब पीढ़े पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे को छू गया, कपड़े का स्पर्श होते ही बच्चा रोने लगा।यह देख कुछ क्षण के लिए तो बड़ी बहन को परिस्थिति की समझ ना लगी लेकिन तत्पश्चात वह सारी घटना समझ गई। क्रोधित होकर वह बोली, “तू मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“तब छोटी बहन ने बताया कि यह बच्चा तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

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